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 आज मैं अपने शादी की 7वाँ सालगिरह पर तमिलनाडु के मदुरै में स्थित मीनाक्षी मंदिर जाना हुआ तथा पार्वती मां और  शिव भगवान का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भव्य दर्शन और पूजा आरती कर मन प्रफुलित हुआ। साथ ही पूरे परिवार के साथ तमाम लोगों के जीवन में सुख समृद्धि हो इसके लिए मां मीनाक्षी से प्रार्थना किया। 







बताते चलें कि मदुरै में स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर का इतिहास 2000 साल से भी पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसका निर्माण पांड्य राजा कुलशेखर पांड्या ने 6वीं शताब्दी ईस्वी में करवाया था। मंदिर का मुख्य आकर्षण देवी पार्वती के अवतार, मीनाक्षी और भगवान शिव के सुंदरेश्वर रूप का मंदिर है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 16वीं और 17वीं शताब्दी में नायक राजवंश के शासनकाल के दौरान विकसित हुआ, जिन्होंने कई गोपुरम और मंडपम का निर्माण करवाया। 


"मंदिर का इतिहास"


प्राचीन उत्पत्ति: माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 6वीं शताब्दी ईस्वी में पांड्य राजा कुलशेखर पांड्या ने करवाया था। 


बता दूं कि किंवदंती के अनुसार, राजा कुलशेखर पांड्या को एक पुत्री का आशीर्वाद मिला, जिसका नाम मीनाक्षी रखा गया। 


मीनाक्षी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है और बाद में उनका विवाह भगवान शिव के सुंदरेश्वर रूप से हुआ। 


16वीं और 17वीं शताब्दी में, नायक शासकों ने मंदिर का विस्तार किया और कई गोपुरम और मंडपम बनवाए। 


मंदिर पर कई बार आक्रमण भी हुए,


मंदिर में 14 गोपुरम (मंदिर के प्रवेश द्वार) हैं, जो द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 


मंदिर में कई मंडपम हैं, जिनमें हजार स्तंभों वाला मंडपम भी शामिल है। 


मंदिर के उत्तर में स्वर्ण कमल तालाब (पोट्टामारई कुलम) है। 


मंदिर की दीवारों पर शिलालेख हैं जो प्राचीन काल के धार्मिक और सामाजिक इतिहास के बारे में जानकारी देते हैं। 


मंदिर में कई चित्रकारी हैं, जिनमें से कुछ नाइक शासनकाल की हैं। 


मंदिर में कई त्यौहार मनाए जाते हैं, जिनमें मीनाक्षी तिरुकल्याणम सबसे महत्वपूर्ण है। 


आज, मदुरै मीनाक्षी मंदिर एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल का दर्शन और जानने का मौका मिला और हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यह मंदिर अपनी वास्तुकला, मूर्तियों और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।


नोट - बचपन से हीं यहां जाने की अभिलाषा थी जो आज सालगिरह के अवसर पर पूर्ण हुआ। 

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