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Showing posts from August, 2022

मधुबनी कपिलदेव झा जी की जुबानी:- "जिस खेत में पेड़ नहीं वो कपिलदेव का नहीं।" इसका मतलब की कपिलदेव जी ने अपने सभी खेतों पेड़ लगाए हुए हैं।

 #मधुबनी कपिलदेव झा जी की जुबानी:- "जिस खेत में पेड़ नहीं वो कपिलदेव का नहीं।" इसका मतलब की कपिलदेव जी ने अपने सभी खेतों पेड़ लगाए हुए हैं।  आपको बताते चलें की बिहार के मधुबनी जिले की कपिलदेव जी अपने 40 एकड़ खेतो में 10000 पौधे और दूसरों में 15 लाख पौधे बांटने वाले कपिल देव झा की कहानी आपको जाननी चाहिए। #BackToFarming आवाज एक पहल और कृषिफाई के द्वारा चलाए जा रहे एग्रीकल्चर टूर ऑफ़ बिहार के दौरान हम लोग मधुबनी के बिरौल गांव में थे। हमारे साथ इस गांव के प्रगतिशील किसान कपिल देव झा थे। बेहद साधारण कद-काठी वाले झा जी के जीवंत कारनामे ऐसे रहे हैं जिसके बारे आपको बताना जरूरी था। कपिल देव जी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए करने के बाद एक प्रतिष्ठित कंपनी में 17 साल तक फाइनेंस मैनेजर के पद पर काम किया। साल 2000 में पिता की मृत्यु के बाद मां की देखभाल के लिए गांव आये , और तब से गांव के होकर रह गए। बेहद सरल भाषा में अपने किए  कार्यों को बताने  वाले कपिल देव जी के फ़ार्म पर जब आप पहुंचेंगे तो आप बिल्कुल हमारे जैसे अभिभूत रह जाएंगे। रोड किनारे 40 एकड़ का बड़ा सा फॉर्म; तरह-तरह...

बैक टू फॉर्मिंग का पहला दिन; हम लोग बिहटा से 250 किलोमीटर की दूरी तय कर मधुबनी पहुंचे। नीरज ठाकुर जी के गांव अकौर में। अकौर मखाना उत्पादन के लिए मशहूर है,छोटे बड़े 70-80 तालाब है यहां।

 आईआईटियन नीरज ठाकुर की मखाने की इनोवेटिव खेती से बदल रही है गांव की तस्वीर। बैक टू फॉर्मिंग का पहला दिन; हम लोग बिहटा से 250 किलोमीटर की दूरी तय कर मधुबनी पहुंचे। नीरज ठाकुर जी के गांव अकौर में। अकौर मखाना उत्पादन के लिए मशहूर है,छोटे बड़े 70-80 तालाब है यहां।  नीरज ठाकुर की स्कूलिंग नेतरहाट से हुई है। उन्होंने आईआईटी मुंबई से आगे की पढ़ाई की और ओएनजीसी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के लिए तकरीबन 33 सालों तक देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में काम किया हैं। रिटायरमेंट के बाद नीरज जी ने गांव में बसने का फैसला किया और पिछले कुछ समय से मखाने की खेती कर रहे हैं। उन्होंने 3.5 एकड़ के प्लॉट में मखाना की 3 वैरायटी लगा रखी है। बातचीत के दौरान हमें पता चला की परंपरागत तौर पर मखाने की खेती तालाबों में होती आई है। तालाब में मखाना उत्पादन करना बेहद किफायती रहा हैं। अमूमन हर साल मखाना तैयार होने के बाद जब उसे जमीन के अंदर से निकाला जाता है तब उसके बहुत सारे फल अंदर ही रह जाते हैं जो अगले वर्ष के लिए बीज के  काम आते हैं। किसान अलग से कुछ खाद और उर्वरक का भी इस्तेमाल नहीं करते।बीज और उर्वरक ...