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 ट्रामा सेंटर नहीं, सरकारी ट्रेज़री का ट्रॉमा!




पटना जिले के बिक्रम का यह ट्रामा सेंटर शायद देश का इकलौता ऐसा चिकित्सा संस्थान है जो बीते 21 सालों से खुद ही आईसीयू में पड़ा है — और किसी डॉक्टर की मदद के बिना ही वेंटीलेटर से कब का हट चुका है। 2001 में केंद्रीय मंत्री डॉ. सीपी ठाकुर ने इसका शिलान्यास किया था, और 2002 तक तो सबकुछ दुरुस्त भी लग रहा था – भवन तैयार, मशीनें फिट, लाइटें ऑन और जनता में उम्मीदों की जगमगाहट!


फिर, जैसे ही 2003 आया, सबकुछ ‘ट्रामा’ की परिभाषा बन गया। न डॉक्टर मिले, न स्टाफ, और न ही प्रशासन को समझ आया कि करना क्या है। सोचा गया – चलो अस्पताल नहीं चला, तो वहां से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही शिफ्ट कर दो। वैसे भी, बिहार में नीति का मतलब अक्सर नहीं थी से लिया जाता है।


तीन करोड़ की मशीनें – एक्स-रे, सी-आर्म, माइक्रोस्कोप – अब कबाड़ की दुकान का सपना देख रही हैं। जिन ओटी लाइटों की चमक से ऑपरेशन थिएटर चमकना था, वो आज झाड़ू भी नहीं झेल पा रही हैं। एंबुलेंस ऐसी हालत में है कि मरीज को ले जाने से पहले खुद को वेंटिलेटर पर रखवाना पड़े!


डॉक्टरों की बात करें तो जो पदस्थ हैं, उनमें से चार "स्टडी लीव" पर हैं — शायद वो 'ट्रामा सेंटर कैसे चालू न किया जाए' पर शोध कर रहे हों।


ग्रामीण इलाकों में जहां सड़क हादसे तीन गुना ज्यादा होते हैं, वहां यह ट्रामा सेंटर बना भी, तो बस पोस्टर-बैनर के लिए। दुर्घटना में घायल हो जाओ, तो या तो भगवान भरोसे रहो नहीं तो दीघा घाट का टिकट तो पक्का है हीं।


अब सुनिए असली कॉमेडी का हिस्सा — चुनाव जैसे ही नजदीक आते हैं, बिक्रम ट्रामा सेंटर का फिर से शिलान्यास का टर्र टर्र टर्र शुरू होता है!

हर बार नया फीता, नई फोटो, नया भाषण — बस इलाज वही पुराना "अस्थायी" समाधान!


कुल मिलाकर, बिहार की मेडिकल व्यवस्था की सेहत खुद गंभीर हालत में है। अस्पताल है लेकिन इलाज नहीं, मशीन है लेकिन कोई चलाने वाला नहीं, और डॉक्टर हैं तो या तो छुट्टी पर हैं या सिस्टम से नाराज़।


बिक्रम का ट्रामा सेंटर अब खुद एक केस स्टडी है — “जब इलाज से ज़्यादा उद्घाटन ज़रूरी हो जाए”।


 पूरे भारत में ट्रामा सेंटर का कांसेप्ट रखने वाले एवं 2001 में भारत का दूसरा ट्रामा सेंटर बिक्रम में लाने वाले विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक एवं बिक्रम-पालीगंज विधानसभा क्षेत्र में विकास पुरुष के नाम से प्रख्यात डॉ0 सीपी ठाकुर एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता थे, लेकिन इनको नजरअंदाज कर पुनः शिलान्यास का खेल खेला गया। 


नोट - शोध जारी है कि खेल क्या है? 


माननीय प्रधानमंत्री Narendra Modi जी यह क्या देखना पड़ रहा है जहां केवल बिल्डिंग के लिए शिलान्यास पर शिलान्यास हो रहा है। कृपया इस पर नजर देने की कृपा करें, ऐसा तो नहीं कि आपको अंधेरे में रखा गया है। 2001 में बने भवन में डॉक्टर बहाल न करके पुनः भवन के लिए शिलान्यास हुआ, क्या इस तरह होता है कि एक ही चीज को बार बार शिलान्यास किया जाए। 


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