Skip to main content

 #बाबा_ब्रहोश्वर ..


कौन हैं ब्रह्मेश्वर मुखिया? 




मुखिया ब्रह्मेश्वर से बाबा ब्रह्मेश्वर बने कैसे? क्या कारण रहा कि हिंसा से दूर रहने वाले इंसान को अपने समय का दुर्दांत हिंसक होना पड़ गया? एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश में क्यों अलग से सेना बनाने की जरूरत पड़ गयी? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं. इन सवालों के अलावा भी कई सारे सवाल हैं, जिन्हें जवाब का इंतजार है.


सबसे पहले तो मुखियाजी को श्रद्धांजलि....💐🙏

आज उनकी हत्या को 9 साल हो गए हैं. दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक कारणों से अभी तक सही हत्यारे सार्वजनिक नहीं हो पाए हैं. उम्मीद करते हैं कि आज नहीं तो कल, परतें उधेड़ी जायेंगी और हत्या करवाने वाले कायर का चेहरा भी बेनकाब होगा. बहरहाल, अब चर्चा करते हैं ऊपर वर्णित सवालों पर.


ऊपर के सारे सवालों के जवाब हम देंगे आगे इसी लेख में, लेकिन उससे पहले कुछ सवाल मैं भी कर लूँ. इससे आगे जनता को समझने में आसानी होगी. फर्ज करिए कि दस हथियारबंद लोग आपके घर पर चढ़ जाएँ और आपको कह दें कि अभी सब छोड़कर यहाँ से भागो...अब सब हम लोगों का है, आप क्या करेंगे? भाग जायेंगे अपना घर छोड़कर या लड़ना पसंद करेंगे? यह भी कल्पना करिए, आप अपने खेत में काम करा रहे हैं, अचानक कुछ लोग आये और बंदूक तान दिये, बोले कि अब खेत हमारा है...आप क्या करेंगे? खेत छोड़ देंगे या लड़ेंगे? आपने महीनों मेहनत करके अपने खेतों में कोई फसल उगाया है, काटने की बारी आयी, कोई वहाँ अपना झंडा लगाकर चला जाए और कह जाए कि यह फसल उसकी...आप क्या करेंगे? फसल छोड़ देंगे या उसी झंडे के डंडा सामने वाले के छिद्र विशेष के सुपुर्द करेंगे? यदि मुझसे पूछा जाए तो मेरा जवाब होगा कि डटकर लड़ने का विकल्प चुनूंगा. संभवतः हर वह इंसान जिसमें गैरत होगी, जो कायर नहीं होगा, यही विकल्प चुनेगा. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने भी यही किया, और इसी फैसले ने ब्रह्मेश्वर मुखिया को बाबा ब्रह्मेश्वर बना दिया.


वीर सावरकर और गांधीजी के बीच हुए पत्राचार से थोड़ी सी बातें यहाँ लिखना चाहूँगा. सावरकर गाँधी को महात्मा संबोधित करते हुए कहते हैं, "आपके विचार और दर्शन दैवीय हैं. किसी भी सभ्य समाज के लिये यह आदर्श है. लेकिन क्या हमारा समाज सभ्य है? यदि देवलोक हो तो आपके ही विचार अनुकरणीय होंगे, लेकिन यह देवलोक है? यदि यह समाज सभ्य नहीं है और यह लोक भी देवलोक नहीं है, फिर यहाँ आपके विचार-दर्शन अप्रासंगिक हो जाते हैं." रामधारी सिंह दिनकर भी प्रसिद्द खण्डकाव्य "रश्मिरथी"  में भीष्म पितामह के मुंह से कहलवाते हैं...."छीनता हो स्वत्व कोई, और तू...त्याग-तप से काम ले यह पाप है; पुण्य है विच्छिन्न कर देना उसे...बढ़ रहा तेरी तरफ, जो हाथ है." यही सत्य भी है. अहिंसा आदर्श है, इसमें कोई शक या सुबहा नहीं है. हालांकि इसके साथ शर्त है कि आपके समक्ष आया तत्व ग्लानि का भाव जानता हो, बौद्धिक अपंग नहीं हो. कुछ कुत्ते आपको काटने दौड़ जाएँ, आप ऐसे में या तो भाग सकते हैं या उन्हें भगा सकते हैं...कीर्तन करने से काम तो चलेगा नहीं.


अब कुछ आंकड़े, कुछ जानकारियाँ रखते हैं. एकवारी गाँव के शिवपूजन सिंह को कुछ लोगों ने 23 फरवरी 1971 को मार दिया. FIR में जगदीश महतो, रामेश्वर अहीर, भिखारी कहार, महाराज महतो और सिंहासन चमार का नाम आया. जगदीश महतो को बाद में जगदीश मास्टर नाम से जान गया. बिहार में नक्सलवाद इसी आदमी ने शुरू किया था. यदि एकवारी को बिहार का नक्सलबाड़ी कहें तो गलत नहीं होगा. बिहार में नक्सल विचारधारा की शुरुआत यहीं से हुई. इसी साल अगले महीने यानी 30 मार्च 1971 को जगदीश सिंह की हत्या कर दी गयी. इसी साल 9 जून को दुधेसर सिंह की भी हत्या हो गयी. अगले पांच साल यानी 1976 तक में ऐसे 15 किसानों की हत्या हो चुकी थी. गौर करने योग्य तथ्य है कि ये सारे भूमिहार ब्राह्मण थे. इस समय ब्रह्मेश्वर सिंह(जन्म 1947) 25-30 साल की अवस्था में थे. यही समय था, 1971 में ब्रह्मेश्वर सिंह खोपिरा गाँव के मुखिया बन गए थे. यहीं से उनका नाम ब्रह्मेश्वर सिंह की जगह ब्रह्मेश्वर मुखिया प्रचलित हो गया. बिहार में नक्सलवाद इसी समय पाँव जमाने लगा था.


धीरे-धीरे इसने पाँव पसारने शुरू कर दिए. कालांतर में बिहार में कथित सामजिक न्याय हुआ. इस सामाजिक न्याय के वक्त ऐसी सरकार आई जिसे कारनामो के वजह से जंगलराज की उपाधि दी गई. अब तो नक्सलियों का पूरे बिहार में छा जाना स्वाभाविक था. यही हुआ भी, धीरे-धीरे  मगध भी इसकी चपेट में आ गया .. रोहतास, बक्सर, भोजपुर, गया, औरंगाबाद, जहानाबाद जिलों में नक्सली हावी होने लग गए. नवादा, नालंदा में भी खासा प्रभाव जमा लिये.

सन 1991, यही वह साल है जब नक्सल हिंसा मुखियाजी के गाँव यानी खोपिरा तक पहुँच गया. इस समय तक नक्सलियों ने बिहार में डेढ़ लाख एकड़ से अधिक जमीन पर लाल झंडा लगा दिया था. लाल झंडा लगा देने के मतलब 144 लगने जैसा समझिये, कि जमीन जिस अवस्था में है उसे वैसे ही छोड़ दीजिये. फसल पक चुकी है, लेकिन आप काट नहीं सकते. इसी साल की बात है, 1991 की, ब्रह्मेश्वर मुखिया अपने खेतों में धान की रोपाई करा रहे थे. नक्सलियों ने धावा बोल दिया. दोनों तरफ से गोलियां चली, दो नक्सली मारे गए. यह संभवतः भारत के इतिहास में पहला मौका होगा जब नक्सली सार्वजनिक मुठभेड़ में निपटा दिए गए. स्थिति तनाव की बन चुकी थी. मुखियाजी अभी भी अपनी ओर से आक्रामक होने से बच रहे थे. वह बचाव की मुद्रा में ही चल रहे थे और चीजों के शांत हो जाने की उम्मीद पाले हुए थे. इस दौरान बिहटा और एकवारी में नक्सलियों ने कई किसानों को मारा. 


अक्टूबर महीना था, साल 1994, मुखियाजी के बगल के एक गाँव बेलाउर में एक सुबह लोग जागे. जागे तो देखे कि पूरे गाँव में लाल पर्चे लगे हुए हैं. पर्चे पर लिखा था, "ध्वस्त किया बिहटा, एकवारी...अबकी बारी बेलाउर की बारी." मुखियाजी यहाँ सक्रिय हुए. पर्चे का जवाब पर्चे से दिया गया. जवाबी पर्चे में कहा गया, "ना बिहटा, ना एकवारी...माले का भूत बेलाउर झारी." इसके बाद नक्सलियों ने बेलाउर पर हमला किया. सात दिनों तक नक्सली पूरे गाँव को घेरे रहे और दोनों पक्षों में गोलीबारी होती रही. हैरान मत होइये, यह नवंबर 1994 की बात है, महज 25 साल पहले की बात. सोचने में लग सकता है कि यह दो-तीन सौ साल पहले की बात होगी, लेकिन नहीं. चूँकि वह समय बिहार में सामाजिक न्याय वाला था, इस तरह की चीजें सामान्य थीं. पुलिस का काम, सामाजिक न्याय में कुछ ख़ास रह नहीं गया था. नक्सली सामाजिक न्याय का एजेंडा जमीन पर उतार ही रहे थे. खैर, सात दिनों की दोतरफ़ा गोलीबारी के बाद नक्सली भाग खड़े हुए. नक्सलियों को यह धृष्टता भारी पड़ गयी. ब्रह्मेश्वर सिंह से ब्रह्मेश्वर मुखिया बन गए इन्सान ने बाबा ब्रह्मेश्वर बन जाने की ओर कदम बढ़ा दिया. रणवीर सेना की कमान अब मुखियाजी के हाथों आ गयी. आगे जो हुआ वह गर्वीला इतिहास है...अद्भुत शौर्य की गाथा है. जिन नक्सलियों को भगाने में हमारे अर्द्धसैनिक बल असमर्थ हो जा रहे हैं, उन नक्सलियों को कम-से-कम बिहार से बाबा ब्रह्मेश्वर ने समूल ख़त्म कर दिया.


यह भी बता जरूरी है कि रणवीर सेना ने जिस दिन अपने उद्देश्य को हासिल किया, सेना भंग कर दी गयी. उद्देश्य था अपने हक़ और हुकूक की रक्षा करना, अपनी अस्मिता पर चढ़ आये लोगों को वापस उनकी खाल में भेज देना, और जिस रोज यह उद्देश्य पूरा हुआ...उसके बाद रणवीरों ने हथियार फिर से बैठक (आधुनिक ड्राइंग रूम) में टांग दिया.


सामाजिक न्याय के बारे में यह भी एक अद्भुत तथ्य है कि इसके शुरुआती दस साल में यानी 1991 से 2001 के दौरान बिहार में 58 नरसंहार हुए. औसत निकलता है कि इस दौरान हर दूसरे महीने बिहार के किसी गाँव में रात में लोग काट दिए जा रहे थे. जब भारत के इतिहास ने पहली अनपढ़ मुख्यमंत्री को देखा, तो उस अनपढ़ के शासनकाल के पहले साल में यानी 1997 में 12 नरसंहार हुए. मतलब कि इस साल बिहार में हर महीने किसी न किसी गाँव में लोग बीच रात सोते हुए में काट दिए गए. बिहार में नरसंहारों की शुरुआत पर बात करें तो पहला नरसंहार हुआ 1992 में. लालू को मुख्यमंत्री बने सही से एक साल भी नहीं हुआ था. यह पहला नरसंहार हुआ था हमारे बगल के गया जिला के बारा गाँव में. इस नरसंहार में 34 किसान मार डाले गए थे, सब सो रहे थे और दरांती से गला काट दिया गया था. मरने वालों में दुधमुंहे बच्चे भी थे, महिलाएं भी थीं, और चलने-फिरने में असमर्थ बूढ़े लोग भी थे. इसकी प्रतिक्रिया में चार साल बाद बथानीटोला नरसंहार हुआ था, जिसमें 22 नक्सली मारे गए थे. आगे तो खैर पूरा सिलसिला है.


मैं यह लिखने से पहले खोज रहा था कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने तत्कालीन घटनाओं को किस तरह से कवर किया है. मजेदार है कि एक भी खबर में मुझे बारा नरसंहार, अपसढ नरसंहार, सेनारी नरसंहार समेत तमाम उन नरसंहारों का जिक्र नहीं मिला, जिनमें #किसान मारे गए थे. लक्ष्मणपुर-बाथे, बथानीटोला आदि पर लेखों और ख़बरों की भरमार है. ऊपर से आरोप भी कि मुख्यधारा की मीडिया ब्राह्मणवादी है. सत्य यह है कि मुख्यधारा की मीडिया में फैशनेबल प्रगतिशीलता का दबदबा रहा है. जैसे सिगरेट पीना मॉड होना हो गया, वैसे ही प्रगतिशील कहलाना फैशन बन गया. इसी फैशन में लक्ष्मणपुर-बाथे, बथानीटोला आदि पर लेखों, ख़बरों की भरमार है. इनके बारे में सेमिनार और कांफ्रेंस करने के लिए वित्तपोषक NGO गिरोह की भीड़ है. खैर, पित्रोदा की तर्ज पर इसे 'जो हुआ सो हुआ' कह देते हैं. साथ में यह सनद भी कि अब एकतरफा प्रलाप को विमर्श के नाम पर स्थापित नहीं होने दिया जाएगा. बाबा ब्रह्मेश्वर ने अपने समय में निर्णायक लड़ाई की और जीत भी उनको मिली. अब निर्णायक लड़ाई गोलियों की बची नहीं है, लड़ाई अब बौद्धिक प्रलापों की है. अब इसे भी जीता जाएगा. 


संदर्भ: पीपुल पॉवर: दी नक्सलाइट मूवमेंट इन सेंट्रल बिहार, लेखक: प्रकाश लुइस. रूल्ड और मिसरूल्ड: स्टोरी एंड डेस्टिनी ऑफ बिहार, लेखक: संतोष सिंह, तत्कालीन खबरें और कुछ अपनी जानकारियां.

@विवेक कश्यप 


साभार ..!

Comments

Popular posts from this blog

बुजुर्ग सिर्फ सीनियर सिटीजन नहीं युवा पीढ़ी के बीच के कनेक्टिंग लिंक (संबंधसूत्र) हैं : डॉ० ममतामयी प्रियदर्शिनी

 बुजुर्ग  सिर्फ सीनियर सिटीजन नहीं  युवा पीढ़ी के बीच के कनेक्टिंग लिंक (संबंधसूत्र) हैं :  डॉ० ममतामयी प्रियदर्शिनी मार्गदर्शक सम्मान सह धरोहर संरक्षण अभियान   जिन्हें हम आजकल सिर्फ सीनियर सिटीजन समझने लगे हैं, वो दरअसल हमारे पूर्वजों और युवा पीढ़ी के बीच के कनेक्टिंग लिंक (संबंधसूत्र) हैं। ये सम्माननीय बुजुर्ग ही हमारे मार्गदर्शक हैं तथा पूर्वजों के धरोहर, थाती, सभ्यता एवम संस्कृति के संवाहक हैं।  सम्मान  जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी प्रेरणा ले सके और अपनी सभ्यता संस्कृति को प्रायोगिक तौर पर समझ सके उपयुक्त बाते डॉ ० ममतामयी प्रियदर्शिनी  ने "गंभीर बाबा मंदिर" के प्रांगण में मार्गदर्शक सम्मान आयोजित कार्यक्रम में कही! उनहोंने कहा की बुजुर्ग किसी परिवार, सामाजऔर देश के लिए एक चटान के तरह होते है!उन्होंने कहा की सामान्यतः दो प्रकार के धरोहरों की बात हमेशा होती है, ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहर, लेकिन मेरा मानना है एक महत्वपूर्ण जीवित धरोहर हमारे बीच हैं, हमारे बुजुर्ग lजो थोड़े नजरंदाज हो रहे हैं। अतः इसी साल डॉ० ममतमयी प्रियदर्शिनी ने  अगस्त ...
 पूरे देश में यह लागू होनी चाहिए। आवारा कुत्तों के काटने से प्रतिदिन लोगों को जाती है जाने।  सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के आवारा कुत्तों को शेल्टर में भेजने और इस काम में बाधा उत्पन्न करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का जो आदेश दिया है, वो भले ही व्यावहारिक रूप से बहुत प्रभावी न हो लेकिन सांकेतिक रूप से इसका महत्व बहुत बड़ा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश से दिखाया कि वो आम जनता की समस्याओं के प्रति सरकार से ज्यादा जागरूक और चिंतित है तथा वह भी इन पर्यावरणवादी पशुप्रेमियों की असली हकीकत से वाकिफ है। लगभग हर महीने और कभी कभी तो हर सप्ताह किसी बालक बालिका या बुजुर्ग की इन आवारा कुत्तों के नोचने के कारण मृत्यु की खबर जब आम हो चुकी है। सुबह की सैर करने वाले या दिहाड़ी नौकरी की मजबूरियों के चलते सुबह जल्दी निकलने वाले या रात में देर में लौटने वाले ग्रामीण कस्बाई छोटे तबके के लोग इन आवारा कुत्तों के भय में जी रहे हैं तब सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश दिखा गया कि उसे वास्तव में फर्जी पशुप्रेमियों से ज्यादा एक आम आदमी की जान की चिंता है। रेबीज एक लाइलाज बीमारी है जो कुत्ते के का...

अपनों ने अपने को लूटा गैरो में कहां दम था, किस्ती थी वहां डूबी जहां कुर्सी की चाह धर्म था ‼️

 विनम्र श्रद्धांजलि 🙏  अपनों ने अपने को लूटा गैरो में कहां दम था, किस्ती थी वहां डूबी जहां कुर्सी की चाह धर्म था ‼️ आपके जैसा ना कोई था, ना कोई हुआ है और ना कोई होगा। इस स्वार्थी दुनिया ने आपके नाम का स्वार्थ साधा है और साध रहा है। मैं तो आपसे कभी रु बा रु नहीं हुआ, परंतु आपकी वीरता की कहानी अपने पूर्वजों से सुना हूं। मैं आपकी तस्वीर जब भी देखता हूं और आपके बारे में जब भी चर्चा होती है तो यही सोचता हूं की कास आप हमेशा हम सभी के बीच होते। हाला की आपकी आत्माएं आज भी हमारे साथ रहती है। आप अमर हैं और अमर ही रहेंगे। जब भी आपके नाम पर लोग अपनी राजनीति रोटी सेंकते है तो मुझे बहुत ठेस पहुंचता है और हमेशा मैं उस व्यक्ति का विरोधी रहता हूं। आज आपके नाम पर कई संगठन तो बनाएं गए परंतु किसी संगठन ने आपके न्याय के लिए नहीं लड़ रहा है बस वह समाज का शोषण और अपनी राजनीति रोटी सेंकने में लगा है। आज लोग आपके नाम पर भीड़ इक्कठा करते हैं और अपनी बाहुबल को दिखाकर समाज का शोषण कर बस अपने आप को निखारने में लगे हैं। आज हमारे समाज को कई भागों में तोड़ दिया गया है जिसे अब जोड़ना बहुत मुस्कील हो गया है। ...