प्रजातंत्र की धरती, भगवान बुद्ध की धरती बिहार आखिर क्यों व्यंग का पर्याय बन गया है।
आज बिहार के लोगों को अन्य राज्यों में अहमियत घटती क्यों जा रही है, जबकि बिहार के लोग यदि दूसरे राज्यों में जाना बंद कर दे तो मुझे लगता है, उन राज्यों का विकास का सारा मार्ग बंद हो जाएगा।
आज बिहार मजदूरों की हालत पर हम जरा फोकस डालेंगे- बिहार के मजदूर अपने रोजी रोटी के लिए दूसरे राज्यों में काम करने जाते हैं, वहां मजदूरी करते हैं, किसी फैक्ट्रियों में काम करते हैं, किसी के घर पर काम करते हैं, किसी के खेतों में काम करते हैं, कोई नौकरी करता है, कोई बड़े-बड़े पदों पर आसीन है। इसमें जो बड़े-बड़े पद पर आसीन हैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। परंतु जो मजदूरी करने जाते हैं, उनके लिए मैं एक बात जरूर कहूंगा, कि यदि यह सभी मजदूर अपने राज्य वापस हो जाएं तो मुझे लगता है कि भारत के तमाम राज्यो के लोग त्राहिमाम करने लगेंगे। हाला कि इसमें कुछ मजदूरों कि भी गलती है जो अपने गांव में मजदूरी नहीं करते हैं बिहार में मजदूरी करने में शर्म आती है और यही कार्य अन्य राज्यों में जाकर के करते हैं और वहां आपको 10 से 12 हजार पर काम कराई जाती है, और यह ₹10000 में आपको वहां रहने की व्यवस्था आपको खाने की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है। मुझे तो नहीं लगता है कि आपको बचत होती होगी और यदि आप रहते होंगे तो आप अपना जीवन फुटपाथ पर बिताते होंगे। यही मजदूरी का काम आपको गांव में दी जाती है, अपने राज्यों के अंदर कई कंपनियों में, खेतों में अन्य कई जगहों पर कार्य दी जाती है तो आप लोग करना नहीं चाहते जबकि यहां आपका पूरा पैसा का बचत है। यहां 10000 महीने पर काम करते हैं तो आप अपना घर का खाना, आपको यहां रहने का घर है, सारी सुविधाएं हैं, आपको देखने वाला अपने लोग हैं वह आपको भाता नहीं है। यही आप दूसरे राज्य में काम भी करते हैं और आपको लात भी मारा जाता है। आखिर आप दूसरे राज्यों में जाते क्यों हैं जब आपको किसी प्रकार की बचत होती ही नहीं है। आप अपने राज्यों में ही क्यों ना योगदान देते हैं यदि आप अपने राज्यों में योगदान देंगे तो आपका राज्य का विकास होगा, आप अपने गांव में योगदान देंगे आपके गांव का विकास होगा, जिससे आपका भी विकास होगा और आपके आने वाले भविष्य का भी विकास होगा। हाला कि यहां कमियां बिहार सरकार की भी है, यदि बिहार में उद्योग लगा होता तो इतनी संख्या में मजदूर दूसरे राज्यों में नहीं जाते।
रही बात सरकार की तो वर्तमान समय में आपकी दुख को आपकी समस्याएं को देखने वाला कोई महापुरुष नहीं है। आज बिहार की स्थिति पर नजर डालें एक ही चीज नजर आती है लूट, डकैती, हत्या, चोरी इत्यादि अपराधिक घटनाएं । कोई किसी का जमीन हरप रहा है, तो कोई किसी का घर हड़प लेता है। बिहार को बस यही चाहिए और इन्हीं लोगों को आज समाज सम्मान करता है, इसमें सारे मजदूर वर्ग के लोग ही हैं जो आपराधिक छवि वाले व्यक्ति का चुनाव करते हैं और उसको जनप्रतिनिधि बना बैठते हैं।
आज बिहार में क्या है, ना शिक्षा है, ना हॉस्पिटल है ना खेलने का साधन है ना उद्योग है, ना प्रशासनिक व्यवस्था सही है और ना ही पर्यटन के दृष्टिकोण से पर्यटकों के लिए संसाधन और पर्यटन स्थलों का सौंदरयीकरण अच्छा है। तो हमारे बिहार में बाहर से लोग क्या करने आएंगे, यह एक बहुत बड़ा कारण है बिहार के विकास ना होने का।
आज बिहार में अर्थव्यवस्था का औद्योगिकीकरण जरूरी-
सुधार के दृष्टि से ‘‘एग्रीकल्चर का इंस्टीट्यूशनल रिफॉर्म होना बहुत जरूरी है। यह अब भी बिहार में लोगों की आय का मुख्य स्रोत है. अगर आप पश्चिमी देशों को देखें, तो पाएंगे कि जो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था (इकोनॉमी) हैं, वे उद्योग आधारित इकोनॉमी से हमेशा पीछे रहती हैं. इंडस्ट्रियल प्रोडक्टिविटी की जो ग्रोथ और जो विस्तार हुआ, वह एग्रीकल्चरल प्रोडक्टिविटी का नहीं हो सका.''
उद्योग-धंधों की बात करें, तो मैन्युफैक्चरिंग लगभग मृतप्राय है. बाहर से उद्यमी आए नहीं, हम लोकल उद्यमियों पर आधारित हैं. हां, इधर इथेनॉल को लेकर थोड़ी उम्मीद बंधी है, लेकिन जब तक अर्थव्यवस्था का औद्योगिकीकरण नहीं होगा, तब तक यही स्थिति बरकरार रहेगी. शुगर इंडस्ट्री खत्म हो गई. हालांकि, अभी कुछ फिर से शुरू हुई हैं।
लैंड रिफॉर्म्स की बात हुई, लेकिन वह हुआ नहीं, तो एग्रीकल्चर का इंस्टीट्यूशनल रिफॉर्म्स कैसे होगा. ‘‘कोसी और गंडक के बाद कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं आया। याद कीजिए सोन कैनाल सिस्टम ने कैसे भोजपुर जिले का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया. एग्रो इंडस्ट्री को भी हम विकसित नहीं कर पा रहे।
आज अपने कुर्सी की लड़ाई, सत्ता सुख पाने की लड़ाई से तमाम राजनेताओं को बिहार के विकास पर बिल्कुल ही नजर नहीं, आज हम अपने बिहार को विकास की मार्ग पर ले जा रहे होते या ले गए होते तो हमें लगता है कि हम बिहार वासियों को बाहर नहीं जाना पड़ता और हम दूसरे राज्यों के लोगों को बिहार आने को मजबूर कर दिए होते। हमें पड़ोसी राज्य से भी कुछ सीखनी चाहिए जहां पर विकास की एक रफ्तार देखने को मिलती है। हम बिहार वासियों को इसी पर चर्चा करनी चाहिए कि बिहार के लोग बाहर क्यों जा रहे हैं, क्यों ना हम बिहार वासियों को दूसरे राज्यों में जाने से रोके, अपने ही राज्य में कार्य को प्रगति दे, उद्योग को प्रगति दे ताकि हमें दर-दर भटकना ना पड़े। आज हमारे बिहार से खेल जगत में कोई नहीं है, फिल्म इंडस्ट्री में कोई नहीं है या बड़ा कोई शिल्पकार नहीं है, और यदि है अभी तो उसे बढ़ावा नहीं दिया जाता, उनके लिए व्यवस्थाएं नहीं की जाती। आज हम पटना से सटे कोईलवर की बात करते हैं जिसे पीतल की नगरी कही जाती है, उस जगह को विकसित करने की जरूरत है, हम मधुबनी को जहां मखाना के मामले में एक अलग ही पहचान है वहां पर और बेहतर व्यवस्था करने की जरूरत है, हम भागलपुर चलते हैं वहां कपड़े के मामले में बहुत बेहतर है हमें उसे बढ़ावा देने की जरूरत है, हम चंपारण में चलते हैं जहां बटन उद्योग है उन लोगों को बढ़ावा दे सकते हैं। और बिहार में कई ऐसे जिला है जहां अलग -अलग चीजों में मशहूर है परंतु सरकारी उदासीनता राजनीतिक उदासीनता के कारण वहां के लोग पिछड़ चुके हैं। आज हम गन्ना की खेती से भाग रहे हैं आखिर क्यों? मुझे याद है की गन्ना खूब होता था और गन्ने की बिक्री अपने नजदीक बिहटा शुगर मिल में करते थे, किसान हमारे खुशहाल भी होते थे आज कृषि के क्षेत्र में जो उदासीनता है जिस तरह से सरकार की रवैया हैं किसान खेती से भागता चल रहा है। आज गांव के लड़के गलत रास्ते पकड़ चुके हैं क्योंकि वो लोग कम पैसों के कारण अच्छे तरह से पढ़ नहीं पाते तो खेती जरूर कर पाते हैं, परंतु जब खेती से कुछ फायदा नहीं होता और उनको गलत प्रलोभन मिलता है जिससे कि वह गलत रास्ते पकड़ लेते हैं। तो हमें इन सभी विषयों पर चिंतन मंथन करनी चाहिए।
आइए हम उन बड़े लोगों की बात करते हैं जो बड़े-बड़े पद पर आसीन हैं भिन्न-भिन्न राज्यों में वह लोग जैसे ही बिहार से बाहर जाते हैं वह अपने बिहार को ही भूल जाते हैं। उनको अपने बिहार से कोई तालुकात नहीं होता वह अपने गांव को भी विकास करने में असफल हो जाते हैं, फिर भी हम गर्व महसूस करते रहते हैं कि हमारे राज्य, हमारे गांव, हमारे जिला के फलना बाबू राज्य में फलना पद पर आसीन है, परंतु वह फलना बाबू यह नहीं सोचते हम जिस मातृभूमि से पले पढ़े हैं उस जगह को भी हमें ध्यान रखनी चाहिए।
समाज- आज समाज की परिभाषाएं ही चेंज हो चुकी है, आज समाज में उन्हीं को सम्मानित किया जा रहा है जो अपराधिक छवि के हैं, जो गलत विचार के हैं, जो गलत रास्ते से पैसा कमा रहे हैं, जो अशिक्षित हैं, जो समाज को तोड़ कर के अपना वर्चस्व कायम कर रहे हैं इन्हीं जैसे लोगों को आज समाज जो है सम्मानित कर रहा है ।यह भी विकास का सबसे बड़ा बाधक है यदि हमें विकास करनी है विकास की रास्ते पर चलने है तो इन सारे कुरीतियों को समाप्त करना होगा। हमें समाज में उन व्यक्तियों को सम्मान करना होगा, जो सही मायने में सम्मान योग्य है, जिन्होंने समाज के लिए त्याग किया हो जो समाज के लिए समर्पित रहा है और यदि वह नहीं कर पाते तो हम गलत व्यक्ति को सम्मान कर रहे हैं, तो हम आने वाले पीढ़ियों को भी बर्बाद कर रहे हैं।
कई विशेषज्ञों का कहना है की रोजगार की कमी होगी, तो लोग दूसरे राज्यों में जाएंगे ही. इनमें अधिकतर संख्या कामगारों की होती है. वे बाहर जाकर भी मजदूरी ही करेंगे या फिर जीवन-यापन के लिए कोई न कोई उपाय ढूंढेंगे। कोई बड़ा पद या ओहदा तो उन्हें मिलेगा नहीं. बाहर गए ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, तो जाहिर है ब्रांड इमेज तो वे ही बनाएंगे अपने वजूद के अनुसार.''
तो आइए हम मिलकर चिंतन करें, मंथन करें और बदलाव करें अपने विचारों से अपनी एकता से ।
@सुमित कुमार
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