राम का चरित्र : मानवीय गुणों का प्रतिबिंब
---- नरेन्द्र शर्मा
जगत् की सार्थकता तभी है, जब जीवन स्थापित है और जीवन का आश्रय स्थल जगत् ही तो है। फलत: जीवन और जगत् के राजमार्ग से होकर ही मनुष्यता, इंसानियत, मानवीय प्रेरणा, मानवीय वर्जनाएं और आदमीयत के सारे क्रिया- व्यापार व भौतिक जीवन के सकल संवेदना और आवेग विकसित, संवर्धित और अनुशासित होते हैं।
यद्यपि, राम ईश्वरीय सत्ता के आवरण में भारतीय लोकमानस की चेतना में स्वीकार्य हैं , तथापि सामाजिक व्यवस्था में मानवीय गुणों के प्रतिनिधि के रूप में राम एक स्थापित चरित्र भी हैं। एक ओर तृष्णा-वितृष्णा, राग- अनुराग, क्रोध- प्रीति जैसे मानव सुलभ गुणधर्म से अनुप्राणित है राम का चरित्र, तो दूसरी ओर क्षमा, दया, त्याग, गांभीर्य, सत्यनिष्ठा, समर्पण, न्यायप्रियता, सौम्यता तथा तात्कालिक निर्णय क्षमता जैसे सामान्य मानवीय बौद्धिक सामाजिक गुणधर्म भी राम के नैसर्गिक चरित्र हैं। अतः ऐसे समय में जब संपूर्ण विश्व ‘मेरे भगवान, तेरे भगवान' के अंधेरकोठरी में कैद है और ‘मेरा मजहब बड़ा, तेरा मजहब छोटा' की संकुचित मानसिकता में घुटन महसूस कर रहा है, तब निश्चित रूप से राम की व्यापक मानवीय दृष्टि भूले को राह दिखाने का एक सशक्त जरिया है। गौर करने की बात है कि राम की सामाजिक पारिवारिक सांस्कृतिक चेतना समन्वयवाद, लोकमंगल कामना और सामान्य मानवीय जीवन-दर्शन के त्रिपदी पर प्रतिष्ठित है।
प्रेम मनुष्य की एक नैसर्गिक प्रवृत्ति है, शाश्वत गुण है। पुष्पवाटिका प्रसंग में राम और सिया के नयनों का मिलना, नि:संदेह सामान्य मानवीय प्रेम का बीजवपन ही तो है। लेकिन यह प्रेम आज के फरेब और लिप्सा-लालसा से बिल्कुल विलग है। यह प्रेम पवित्रता और शालीनता के उदात्त सुमेरु पर आसीन है- “गिरा अनयन नयन बिनु बानी ।” आज की जवान होती नई पीढ़ी को प्रेम का यह विराट रूप-स्वरूप समझने की जरूरत है। दिखावे और मूर्खता के मकड़जाल में फंसी हुई आज की इस नई पीढ़ी को अपनी कमी छुपाने के लिए हमेशा एक बहाना की तलाश होती है। फलतः उन्हें राम और सिया के इस उच्चस्तरीय प्रेम को समझने में परेशानी भी हो सकती है।
क्रोध, गुस्सा, जिद्द आदि हमारे और आपके सामान्य मानवीय गुण हैं और इसे राम के जीवन प्रसंगों में भी देखा जा सकता है। लेकिन आज जब हम ताकतवर और क्षमतावान होते ही ऐंठने लगते हैं, अपनी बांहें चढ़ाकर दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते हैं। सामर्थ्य की शक्ति का उद्देश्य है लोक-जीवन में हमेशा दूसरों की भलाई , न कि सामर्थ्य दूसरों को प्रताड़ित करने के लिए अहंकार-शक्ति है । राम वैसे मानवीय गुणों के वाहक हैं जहाँ व्यक्ति अपनी शक्ति, बुद्धि और प्रज्ञा को बिल्कुल पचा लेता हो। अहंकार-जड़ित ऊर्जा या प्रज्ञा हमेशा विषाक्त है। हमें याद करना होगा कि समुद्र से मार्ग मांगते समय राम तरह-तरह से समझाते हैं, हजार मिन्नतें करते हैं, बार-बार निवेदन करते हैं, जबकि वे क्षमतावान हैं। जब राम हर प्रकार से हार जाते हैं, थक जाते हैं, तब अपनी क्षमता दिखाते हुए कहते हैं- “लछिमन बान सरासन आनू। सोषों बारिधि बिसिखि कृसानु।। " साथ ही साथ क्रोध में तमतमाए राम कहते- ‘बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।’ वनगमन की कष्टकर चुनौती के बीच भी विचलित नहीं होने वाले राम यदा-कदा क्रोधित हो जाते, कुपित हो जाते हैं। यह दीगर बात है कि राम का क्रोध स्थाई नहीं है, हमेशा के लिए नहीं होता । आम लोगों के दैनंदिन की जिंदगी में स्थिति- परिस्थिति के अनुसार उपजा क्रोध हमें देखने को मिलता है। राम का क्रोध भी ऐसे ही सामान्य परिस्थितियों से पनपता है। गौर कीजिए, इंद्र-पुत्र जयंत द्वारा कौवा का रूप धारण कर सीता के पैर में चोंच मारने पर राम एक साधारण आदमी की तरह क्रोध से तप रहे हैं। गोस्वामी जी लिखते हैं-
“सीता चरण चोंच हतिभागा । मूढ़ मंद मति कारन कागा ।
चला रुधिर रघुनायक जाना । सीक धनुष सायक संधाना ।।"
इतना ही नहीं ‘किष्किंधा कांड' के ‘बालि वध' प्रसंग में क्रोध का यह मानवीय मनोविज्ञान सहज ही समझा जा सकता है।
शक या संदेह हम सामान्य लोगों का मनोविज्ञान है। हालांकि, राम के चरित्र में संदेह की अधिकता नहीं है। फिर भी कभी-कभार लक्ष्मण और राम के बीच इस प्रकार के प्रसंग आ जाते हैं। यह दूसरी बात है कि राम अपने बुद्धि-विवेक से लक्ष्मण के सारे संदेहों का शमन करते हैं। तुलसी ने तो राम के चरित्र को ही आदमी के सारे भ्रम और संशय खत्म करने वाला माना है- ‘राम कथा सुंदर कर तारी । संसय विहग उड़ावनिहारी।'
हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि छोटी सोच हमेशा समस्या को जन्म देती है और बड़ी सोच हमें समाधान के तरफ बढ़ाती है । राम का जीवन-चरित्र समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए, शक और संदेश अथवा गलतफहमी की गुंजाइश ही नहीं। हमें भी अपने जीवन में यह समझना होगा कि यदि हमें समाधान की ओर बढ़ना है, तो हरेक स्थिति में गलतफहमी या संदेह से दूर रहना ही होगा।
अयोध्या में राज्याभिषेक की तैयारी हो रही है। चहुंओर खुशियों की शहनाई बज रही है। जनमानस के बीच संभावनाओं के नए द्वार खुलने की प्रत्याशा है। तत्काल राजप्रासाद से राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र श्री राम को बुलावा भेजते और वनगमन की बात कहते हैं। राम धीर-प्रशांत सामान्य मानवी-बोध और गांभीर्य लिए बिल्कुल एक सामान्य आदमी के जैसे पिता के उस आदेश और प्रस्ताव को सहर्ष तत्क्षण स्वीकारते हैं । इतना ही नहीं माता कौशल्या के पूछने पर कहते हैं – ‘पिता दीन्ह मोहि कानन राजू।' जरा सोचिए, भला सुविधाएं छोड़कर कष्ट और संकट क्यों चुना जाए! लेकिन हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि चुनौतियां हमें मांजती हैं। संघर्ष की भठ्ठी में तपकर ही हम परिपक्व होते हैं। सुख-सुविधाओं के राजमहल में हमारा संपूर्ण शख्सियत नहीं निखर सकता है । इसलिए वनगमन की चुनौतियों में राम अवसर तलाशते हैं, समस्याओं का रोना नहीं रोते। यह सामान्य मानव-जाति के लिए एक सकारात्मक संदेश है।
अवसाद (डिप्रेशन) आज की दुनिया में एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है । दुनिया भर में लाखों लोग आज अवसाद से जूझ रहे हैं। बहुतों ने तो आत्महत्या तक कर ली । हाल के वर्षों में डिप्रेशन एक जटिल मनोवैज्ञानिक विकार के रूप में पैर पसारा है । आप गौर कीजिए, राम इस मानसिक-मनोज्ञानिक समस्या को पहचानते हैं और इसका निदान भी उनके पास है । जब विभीषण- रावण संवाद में विभीषण कहते हैं-
‘जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियं रावन ।।'
और
‘जन रंजन तजि नाइअ माथा । प्रनतारति भंजन रघुनाथा ।।'
लेकिन इससे बेअसर रावण और अधिक क्रोधित हो जाता है। अहम ( ego) और अहंकार की पट्टी व्यक्ति को अंधा बना देता है, सोचने की शक्ति खत्म कर देता है । विभीषण के लिए रावण के अपमानजनक शब्द सामने आते- “मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीति । सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ।" निश्चित रूप से कोई भी व्यक्ति अपमानित होकर परेशान हो जाता है । शायद यही स्थिति विभीषण की भी रही होगी। लेकिन राम का सवेदनशील मनोविज्ञान देखिए, वे विभीषण से मिलने पर कुशलक्षेम पूछते हुए कहते हैं- ‘कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ।' चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान (Medica। Science & Psycho।ogy) भी मानता है कि सामाजिक क्रिया-व्यापार ( socia। conducts and activities) तथा सामाजिक स्वीकार्यता ( socia। acceptance) अवसाद के स्तर को कम करता है । राम ने भी ‘कहू लंकेस' कहकर विभीषण को हौसला दिया । यह हमारा सामान्य मानवीय गुण-धर्म होना चाहिए ।
माता कैकयी भी अपराध बोध से ग्रस्त हैं तथा उनके इस अपराध बोध से मुक्ति के लिए भी राम प्रयास करते हैं। हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि मन में अपराध-बोध का विचार भी हमें कमजोर करता है, अंदर से आदमी को तोड़ देता है । बेशक, राम इस मनोविज्ञान को भी बड़ी बारीकी से समझते हैं। अतः निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि राम मानवोचित मनोविज्ञान के संदेशवाहक के रूप में हमारे समाज में प्रकाश फैलाते हैं ।
जाति-वर्ण हमारी सामाजिक व्यवस्था की एक क्रूर सच्चाई रही है। आधुनिक नवबौद्धिक समाज हमेशा तुलसी और तुलसी के राम पर नारी विरोधी, ब्राह्मणवादी, ऊंच-नीच के पक्षधर होने के आरोप गढ़कर मनगढ़ंत मुहावरों के सहारे उन्हें कठघरे में खड़ा करता रहा है। ‘उत्तर कांड' के अग्नि-परीक्षा तथा एकाध अवांतर प्रसंगों और क्षेपकों के जरिए उनके देदीप्यमान चरित्र को बिगाड़ने की कोशिश की जाती है। 'शंबूक वध' की एक कड़ी जोड़ दी जाती है आजकल । ‘शबरी के जूठे बेर' खाते हैं राम और उन्हें ‘भामिनी' कहकर संबोधित करते हैं। केवट-राम संवाद में भी राम कहते- ‘बिहसे करुनायेन चितइ जाखनी लखन तन' तथा ‘बिदा कीन्ह करुनायत भगति बिमल बरु देइ।' सामाजिक ढांचे में नीचे के पायदान पर खड़े केवट को न केवल स्वीकारते, बल्कि उसके सहयोग के आभार को भी मानते। जटायु के प्रति राम का सम्मान भी सर्वसमाज की सर्वग्राह्यता की ही तो संकल्पना है। शापित अहिल्या की मुक्ति भी इस समाज में सर्वस्वीकार्यता और व्यापक नारी चेतना जागरण के लिए प्रेरक-बिंदु है। फलतः हालिया समय में कुतर्क अथवा बेमतलब की बतकही से समाज में विद्वेष, ईर्ष्या और भेद- बुद्धि पैदा करने के उद्देश्य से कुछ बौद्धिक जुगाली करने वाले लोग हमेशा तुलसी और उनके राम के सार्वभौम सर्वसमाजी सर्वग्राह्य चरित्र को छोटा बनाने व दिखाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं ।
मित्रता और कृतज्ञता को सही तरीके से स्वीकारना एक मानवीय गुण-धर्म है। हालांकि, जिस तरह से आज हर एक रिश्ते को मापा जा रहा है, वैसी स्थिति में हमारी अच्छाइयों पर भी प्रश्न खड़े हुए हैं । नि:संदेह हम दिग्भ्रमित हुए हैं, सही रास्ते से भटके हैं। लेकिन राम अपने सेवक हनुमान को 'भरतहि सम भाई' कहकर गले लगाते हैं। जामवंत को बुजुर्ग और अनुभवी होने के चलते यथोचित सम्मान देते हैं। लिए गए के सारे निर्णयों में जामवंत की राय सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। आज जबकि नई पीढ़ी अपनी पहले की पीढ़ी को निकम्मा और बेकार समझने की भूल कर रही है, तब राम का चरित्र समाज में व्यापक बौद्धिक, सामाजिक पारिवारिक संस्कार को स्थापित करता है-
‘जामवंत कह तुम सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक ।।'
हमारे घर-परिवार में अथवा किसी अपने सगे-संबंधी के साथ कुछ भी बुरा होने पर हम परेशान हो उठते हैं, बेचैन हो जाते हैं तथा तरह-तरह के नकारात्मक सोच दिमाग में आते हैं। कभी न टूटने वाले राम को आप लक्ष्मण के मूर्छित होने पर व्याकुल व विह्वल होते देख सकते हैं-
‘बरु अपजस सहतेहुं जग माहीं ।
नारि हान विशेष छति नाहीं।।'
यहां भी आप राम का सहज ही सामान्य मानवीय व्यवहार देख सकते हैं ।
हमें गौर करना चाहिए कि वनगमन के पश्चात् भरत अपने गुरुजी, रिश्तेदार, माताओं के साथ राम को वन से लौट आने का निवेदन लेकर जाते हैं । वहां हर एक विषय पर चर्चा होती है, प्रजा के अनाथ होने की बात तक कही जाती है । साथ ही साथ ‘घर मसान परिजन जनु भुता' से भी राम भावुक नहीं होते। किसी स्थिति में राम लौटने के प्रस्ताव को नहीं स्वीकारते। आज दुनिया भर में लोकतंत्र की होड़ लगी है। इसे आज की तारीख में सर्वोत्तम शासन व्यवस्था के रूप में स्वीकारा जा रहा है। लोकतंत्र में 'जनमत' अथवा 'पब्लिक ओपिनियन' ही सर्वोपरि है, लेकिन राम ‘लोकनीति' को ‘लोकमत' पर भारी मानते हैं। अपने देश भारत में यदा-कदा छोटी-छोटी माँगो को लेकर धरना, जुलूस, हड़ताल, तोड़-फोड़, आगजनी आदि की घटनाएं आए दिन दिखते हैं। हमेशा इसप्रकार की माँगें तार्किक और उचित हों, ये जरूरी नहीं। कभी-कभार दबाव की सियासत करने के उद्देश्य से भी बड़ी संख्या में भीड़ या जत्था सड़कों पर आ जाती। हमें सोचना चाहिए कि हमेशा बहुसंख्यक विचार ही सही हो,यह जरूरी नहीं । लोगों की भावनाएं हमेशा औचित्यपूर्ण हो, यह जरूरी नहीं। । भीड़ हमेशा जायज ही सोचे, ये आवश्यक नहीं । किंतु, लोकनीति, सुनीति और एथिक्स (Ethics) हमेशा ही समाजोपयोगी और सार्थक है। और घर नहीं लौटकर राम इस मानवीय लोकनीति की प्रतिष्ठा की वैचारिक प्रतिबद्धता पर अपनी मुहर लगाते हैं ।
आज के इस 21वीं शताब्दी में भी हमें रोज कोई न कोई ताड़का,सुरसा, कालनेमि, मारीच जैसे नकारात्मक शक्तियों से सामना होता ही रहता है। ये हमें सद्पथ से भ्रमित करना चाहते, बुरा बनाना चाहते, लक्ष्य से भटकाने की भरपूर कोशिश करते हैं । दुष्टों के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है- ‘खलन्ह हृदय अति ताप विसेषी।' अतः राम का चरित्र ऐसे दुष्टों से बचने का प्रयास तथा उनके दमन और शमन का भी पैगाम है।
आज जब हमारे पारिवारिक मूल्य अपरदित हो रहे हैं। संयुक्त परिवार की संकल्पना लगभग अंतिम सांसे गिन रही हैं। ऐसी स्थिति में पारिवारिक मूल्यों को स्थापित करना भी राम के जीवन चरित्र का बहुआयामी पक्ष है। भाई-भाई में संबंध, माता-पिता से हमारी आत्मीयता, पति-पत्नी के बीच भरोसे का रिश्ता, परिवार के अन्य सदस्यों में परस्पर नेह और प्रीति तथा अंडरस्टैंडिंग कोई राम के जीवन चरित्र से सीखे। इतना ही नहीं, परिवार को परिवार बनाए रखने के लिए एकमात्र मंत्र है- ‘जहां सुमति तहं संपति नाना'। बेलाग कहूंगा कि आज के समाज में विविध विकृतियों ने पैर फैला रखे हैं। पति और पत्नी के बेडरूम के हल्के-फुल्के कलह भी कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच रहे हैं। देह से होकर आत्मा तक प्रवेश करने वाला पति- पत्नी का यह भरोसा भी तार-तार हुआ है। न जाने कितने डिवोर्स के मामले अदालती निर्णय की प्रतीक्षा में हैं । इस विकट समय में सीता के द्वारा कहा जाना कि पति के बिना पत्नी का जीवन जल से रहित नदी के समान है और राम की एकनिष्ठ दाम्पत्य आज के बिगड़ते सामाजिक-पारिवारिक तस्वीर को आईना दिखाता है। और एक हद तक मानवीय गुणों के स्थापना की पारिवारिक प्रतिबद्धता की ओर इशारा भी है ।
अतः झोपड़ी से महलों तक स्वीकार्य राम का चरित्र हमारे जीवन-दर्शन और जीवनोपयोगी चेतनाओं का चलचित्र ही तो है । मानव के रोजमर्रे की गतिविधियों का मिलनस्थल और संदेशवाहक है- राम का चरित्र। हमारी जिंदगी की रपटीली राहों को सपाट और सुंदर बनाने का मानवीय पथप्रदर्शक चेतना-बिंदु है- ‘राम का चरित्र।’
लेखक- श्री नरेन्द्र शर्मा
नौबतपुर, पटना, बिहार

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