बैक टू फॉर्मिंग का पहला दिन; हम लोग बिहटा से 250 किलोमीटर की दूरी तय कर मधुबनी पहुंचे। नीरज ठाकुर जी के गांव अकौर में। अकौर मखाना उत्पादन के लिए मशहूर है,छोटे बड़े 70-80 तालाब है यहां।
आईआईटियन नीरज ठाकुर की मखाने की इनोवेटिव खेती से बदल रही है गांव की तस्वीर।
बैक टू फॉर्मिंग का पहला दिन; हम लोग बिहटा से 250 किलोमीटर की दूरी तय कर मधुबनी पहुंचे। नीरज ठाकुर जी के गांव अकौर में। अकौर मखाना उत्पादन के लिए मशहूर है,छोटे बड़े 70-80 तालाब है यहां।
नीरज ठाकुर की स्कूलिंग नेतरहाट से हुई है। उन्होंने आईआईटी मुंबई से आगे की पढ़ाई की और ओएनजीसी जैसी प्रतिष्ठित संस्था के लिए तकरीबन 33 सालों तक देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में काम किया हैं।
रिटायरमेंट के बाद नीरज जी ने गांव में बसने का फैसला किया और पिछले कुछ समय से मखाने की खेती कर रहे हैं। उन्होंने 3.5 एकड़ के प्लॉट में मखाना की 3 वैरायटी लगा रखी है। बातचीत के दौरान हमें पता चला की परंपरागत तौर पर मखाने की खेती तालाबों में होती आई है। तालाब में मखाना उत्पादन करना बेहद किफायती रहा हैं। अमूमन हर साल मखाना तैयार होने के बाद जब उसे जमीन के अंदर से निकाला जाता है तब उसके बहुत सारे फल अंदर ही रह जाते हैं जो अगले वर्ष के लिए बीज के काम आते हैं। किसान अलग से कुछ खाद और उर्वरक का भी इस्तेमाल नहीं करते।बीज और उर्वरक के बचत के कारन यह खेती कम खर्चीला होता है।
नीरज जी मखाने की खेती अपने खेतों में करतें हैं। इसके कुछ अपने फायदे हैं, तालाब के अपेक्षा खेतों से मखाना निकालना आसान होता है। कंट्रोल इरिगेशन सिस्टम होने के कारण खेतों में लगाए गए पौधे की विकास बेहतर होता है जिसे कारन उत्पादन में भी वृद्धि होती है।तालाब में होने वाले मखाने की साइज साल दर साल छोटी होती जाती वहीं खेतों से निकले मखाने बड़े साइज के होते हैं। नीरज जी का मानना है कि किसान अगर थोड़ा सा इन्वेस्टमेंट कर के तालाब के जगह अपने खेतों में मखाना का उत्पादन करें उन्हें ज्यादा फायदा होगा।
सरकारें भी इन्हीं फायदे को देखते हुए खेतों में किए जाने वाले मखानों को प्रोत्साहित कर रही है एवं विभिन्न तरह की सुविधाएं उपलब्ध करा रही है।
मखाने की खेती के लिए सबसे पहले फरवरी में नर्सरी लगाई जाती है। तत्पश्चात खेतों में उचित मात्रा में उर्वरक डालकर उन्हें तैयार कर लिया जाता है। नीरज ठाकुर अपने खेतों में वर्मी कंपोस्ट और जीवामृत जैसे जैविक उत्पादों का प्रयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि मार्च के महीने में नर्सरी से मखाना के पौधों को खेत में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है ।ट्रांसप्लांटेशन के काम के लिए एक विशेष स्किल वाले लेबर की जरूरत होती है ।विशेषकर मछुआरा समुदाय के लोग इसे किया करते हैं।
ट्रांसप्लांटेशन के समय खेतों में तकरीबन 9 इंच तक पानी रखना अनिवार्य होता है। मखाने के बढ़ते पौधे के साथ ही कुछ एक्वेटिक वीड्स भी बढ़ने लगते हैं जिनका निदान करना आवश्यक होता है। समय-समय पर जल का स्तर बढ़ाते रहना होता है और उसे तकरीबन ढाई फीट तक ले जाकर छोड़ देना होता है। बढ़ते जलस्तर के साथ पौधों की लंबाई में भी बढ़ोतरी होती है और अप्रैल-मई के महीने तक पौधे पूरे खेत को ढक लेते हैं। मई में नजारा काफी खुशनुमा होता है । दरअसल मखाने के पौधों मे चटख लाल रंग का फूल खिला होता है जिसे देखने वाले मंत्रमुग्ध रह जाते हैं। मखाने को हार्वेस्ट की तैयारी जुलाई और अगस्त के महीने में शुरू जाती है।
मखाने को खेत से बाहर निकालना बहुत आसान काम नहीं है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षित मछुआरे समुदाय के लोग होते हैं जिनकी पीढ़ियां इस काम को वर्षों से करती आई है। कांटेदार पौधों के बीच,पानी के नीचे और कीचड़ में सने हुए फल जमीन के सतह पर बिखरे होते हैं ।फल को स्थानीय बोली में गोड़ी नाम से बुलाया जाता है। मटमैला पानी में स्थानीय मजदूर अपने कौशल का इस्तेमाल करते हुए एक-एक करके बिखरे हुए सभी फलों को इकट्ठा करते हैं जिसमें काफी वक्त और मेहनत की जरूरत होती है। तालाब में और भी मुश्किल हालात होते हैं क्योंकि उसमें ज्यादा पानी होता है। यही कारण है कि तकरीबन 50 परसेंट से अधिक फल तालाब में ही रह जाते हैं।
इसके बाद गोड़ी की सफाई के लिए एक अलग व्यक्ति होता है जिसे साफी नाम से बुलाया जाता है।फल को बाहर निकालने के बाद उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है । सूखने के बाद बाद उसे निश्चित तापमान पर अलग-अलग बर्तनों में भूना जाता है। आखिर मे मखाने को नेचुरल कवर से बाहर निकालने के लिए तोड़ने का काम किया जाता है। इसे तोड़ने के लिए भी एक विशेष प्रशिक्षित मजदूर की जरूरत होती है जिसे स्थानीय बोली में तोड़ी कहा जाता है। उन्हें इस बात की समझ होती है कि कितने बल के साथ मखाने को उसके कवर से अलग करना है। इस काम में गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती अगर थोड़ा सा भी उलटफेर हुआ तो मखाना का मार्केट वैल्यू कम हो जाता है।
नीरज जी बताते हैं कि वर्तमान समय में उन्हें 1 क्विंटल मखाने के फल के उत्पादन में तकरीबन ₹6500 खर्च करने पड़ते हैं। स्थानीय स्तर पर अभी बाजार डेवलप हो रहा है जिसे कारण साल दर साल इसके दाम घटते बढ़ते रहते हैं। हर साल अगर बाजार भाव 12000 से ऊपर रहें तभी इसकी खेती लाभकारी मानी जायेगी।
पिछले साल गोड़ी की कीमत ₹16000 प्रति क्विंटल की रही जिससे किसानों को बहुत फायदा हुआ । इस साल है आसार नजर नहीं आ रहे हैं। लाभ को देखकर मखाना की खेती बढी है जिसके कारण इसके दाम गिर सकते हैं। अगर यह 10000 से नीचे आया तो बहुत सारे किसानों को नुकसान सहना पड़ सकता है।
#BackToFarming:-Agriculture Tour Of Bihar हम आशान्वित हैं कि यह यात्रा बिहार के किसानों के लिए खुशियों का द्वार खोलेगा। यात्रा को लेकर हर ज़िले के किसान बेहद उत्साहित हैं।
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सभी का सहयोग जरूरी है
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