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डॉ सत्यजीत सर के योगदान से अब कितना खूबसूरत दिखने लगा है बिहटा स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम। - सुमित कुमार

 डॉ सत्यजीत सर के योगदान से अब कितना खूबसूरत दिखने लगा है बिहटा स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम। 









बताते चलें कि जब मैं छोटा था और यहां जाता था, उस समय यह आश्रम की स्थिति काफी जर्जर थी, कोई देखने वाला इस आश्रम को नहीं था। जिसको जो मन में आता था वह यहां करता था। कई बार तो यहां नाच प्रोग्राम भी हो चुका है, यहां जितने भी स्वामी जी का कमरा था वह जर्जर हालत में था। पूरा कैंपस एरिया जंगल सा हो गया था।  परंतु आज इतना सुंदर और मनोरम दृश्य जो आपको देखने को मिल रहा है इसमें अहम योगदान अम्हारा निवासी एवं रुबन हॉस्पिटल के मालिक डॉ सत्यजीत सर का है। उन्होंने इस आश्रम का रूपरेखा है बदल दिए। साथ ही जो हमारे स्वामी जी के द्वारा लिखी हुई किताबें थी जिसे कई ईसवी पूर्व विदेशी द्वारा ले जाया गया था और सभी किताबों को वहां से लाना एक बहुत ही कठिन काम था जबकि सत्यजीत सर ने उस किताबो को पुनः वापस लाने का काम किए हैं। इस कैंपस में स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के धरोहर को बचाते हुए और भी कई उनके चिन्ह को अलग-अलग कमरे में बखूबी से संवारने का काम डॉ सत्यजीत सर ने किया है आज मैं डॉक्टर सत्यजीत सर को एवं उनके और भी साथ देने वाले लोगों का आभार प्रकट करता हूं।  जिनके कारण आज स्वामी जी का यह आश्रम का कायाकल्प बदल गया है। यह हमारे पूरे बिहार ही नहीं पूरे भारत के लिए बहुत ही गर्व की बात है, इतना महत्वपूर्ण जगह हमारे बिहटा में स्थित है। हम बहुत ही सौभाग्यशाली हैं कि स्वामी जी हमारे बिहटा में रहे हैं।


वर्ष 1949 में, महाशिवरात्रि के पर्व पर स्वामी जी ने पटना के समीप बिहटा में सीताराम आश्रम को स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना। वहीं से वह पूरे आंदोलन को संचालित करते थे।

जहां तक मुझे मालूम है स्वामी जी किसानों के मसीहा एवं सबसे बड़े समाजसेवी भी थे। यहां स्वामी सहजानंद सरस्वती जी से मिलने हजारों हजार किसानों आया करते थे और स्वामी जी के द्वारा उन्हें हर प्रकार से मदद किया जाता था।  जमींदारी प्रथा भी हटाने का आंदोलन स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के द्वारा ही छेड़ा गया था। साथ ही इन्होंने समाज हित में समाज का विकास करने हेतु कई महत्वपूर्ण कदम उठाएं। 


नोट- आप भी हमारे बिहटा में स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम में पधारे और स्वामी जी के जीवन को जाने।


लेखक - सुमित कुमार, 

युवा समाजसेवी

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